Breaking News

Supreme court का सुप्रीम निर्देश, तीन माह में सुरक्षित फैसले के फैसला सुनाया जाय

Supreme court का सुप्रीम निर्देश, तीन माह में सुरक्षित फैसले के फैसला सुनाया जाय

नई दिल्ली से वेदप्रकाश रस्तोगी के साथ भोपाल से राधावल्लभ शारदा द्वारा संपादित रपट :

न्यायिक प्रक्रिया में देरी को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सभी हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि फैसला सुरक्षित (रिजर्व) करने की तारीख से तीन महीने के भीतर फैसला सुनाया जाए। शीर्ष अदालत ने कहा कि फैसलों में देरी से मुकदमेबाजों को अपूरणीय नुकसान होता है और विशेष रूप से व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में त्वरित निर्णय आवश्यक है।
जमानत अर्जी पर फैसला तुरंत होगा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत अर्जियों पर आदेश उसी दिन सुनाया जाना चाहिए। यदि किसी कारणवश जमानत आदेश रिजर्व किया जाता है, तो उसे अगले दिन अनिवार्य रूप से सुनाकर अपलोड किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि जमानत या सजा निलंबन का आदेश सुनाए जाते ही जेल प्रशासन को तुरंत सूचित किया जाए, ताकि विचाराधीन कैदी या दोषी को प्राथमिकता के आधार पर उसी दिन, या अधिकतम अगले दिन रिहा किया जा सके।

किस याचिका की सुनवाई कर रहा था सुप्रीमकोर्ट
इस संबंध में अनुपालन रिपोर्ट ट्रायल कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट को भेजने की व्यवस्था भी निर्देशों में शामिल है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान यह दिशा-निर्देश जारी किए। याचिका में हाईकोर्ट के एक फैसले को अपलोड करने में देरी का आरोप लगाया गया था। पीठ ने इस मुद्दे को व्यापक मानते हुए कई अहम निर्देश तय किए, ताकि फैसला सुनाए जाने और अपलोडिंग में टाइमलाइन सुनिश्चित हो सके।

15 दिन में साइट पर अपलोड होगा ऑर्डर
शीर्ष अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए कहा कि अगर केवल फैसले का ऑपरेटिव हिस्सा सुनाया जाता है, तो विस्तृत कारण युक्त निर्णय 15 दिनों के भीतर अपलोड होना चाहिए। साथ ही, अगर रिजन्ड ( कारणयुक्त) फैसला ओपन कोर्ट में सुनाया जाता है, तो उसे 24 घंटे के भीतर हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड करने का निर्देश दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने किया स्पष्ट
अदालत ने यह भी व्यवस्था दी कि यदि आदेश रिजर्व होने के चार महीने के भीतर फैसला नहीं सुनाया जाता, तो पक्षकार हाईकोर्ट के मुख्य जस्टिस से संपर्क कर सकते हैं, ताकि मामला किसी अन्य पीठ को सौंपा जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने अंत में स्पष्ट किया कि ये निर्देश किसी विशेष न्यायाधीश या किसी हाईकोर्ट पर टिप्पणी करने के उद्देश्य से नहीं हैं।

फैसला रिजर्व होने के अधिकतम तीन महीने में सुनाना होगा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने
हाईकोर्ट्स में रिजर्व मामलों में फैसले सुनाने में हो रही देरी पर रोक लगाने के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इन निर्देशों को “बाइंडिंग डायरेक्शंस” बताते हुए कहा कि जिन मामलों में फैसला सुरक्षित (Reserved) किया गया है, उनमें कारण युक्त निर्णय अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाया जाए।

दूसरी पीठ को ट्रांसफर हो सकता है केस
अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों, खासकर जमानत याचिकाओं में त्वरित आदेशों पर विशेष जोर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी पीठ द्वारा फैसला सुरक्षित करने के बाद चार महीने (3+1 महीने) तक निर्णय नहीं दिया जाता, तो पक्षकार हाईकोर्ट के सीजेआई के समक्ष आवेदन देकर मामला दूसरी पीठ को स्थानांतरित कराने का अनुरोध कर सकता है। इसके अलावा, यदि तीन महीने में फैसला नहीं आता तो पक्षकार “जजमेंट रिलीज” के लिए आवेदन कर सकता है, जिसे दो दिनों के भीतर सूचीबद्ध करने का निर्देश है।

हर महीने के आखिर में रिजर्व और पेंडिंग केसों की सूची
क्रिमिनल अपील या डेथ रेफरेंस जैसे मामलों में, जहां फैसला सुरक्षित है और अपीलकर्ता हिरासत में है, पीठ को 7 दिनों के भीतर पक्षकारों से स्पष्टीकरण मांगने की अनुमति दी गई है। अन्य मामलों में यह अवधि एक महीने से आगे नहीं बढ़ाई जा सकेगी। साथ ही, खुले न्यायालय में सुनाए गए कारणयुक्त निर्णय को 24 घंटे के भीतर हाईकोर्ट वेबसाइट पर अपलोड करने का निर्देश भी दिया गया है। प्रशासनिक स्तर पर, हाईकोर्ट के चीफ जज को वेबसाइट में ऐसी व्यवस्था करने को कहा गया है कि हर महीने के अंत में रिजर्व और लंबित मामलों की सूची का स्वचालित ईमेल मुख्य न्यायाधीश को जाए और संबंधित पीठ को भी कॉपी मिले।

क्या होगा फैसले से लाभ
इस निर्देश से न्यायिक देरी घटेगी, फैसले समय पर आएंगे और पारदर्शिता बढ़ेगी। जमानत आदेश उसी/अगले दिन होने से अनावश्यक हिरासत रुकेगी, व्यक्तिगत स्वतंत्रता सुरक्षित होगी। आदेश तुरंत अपलोड व जेल को सूचना से रिहाई तेज होगी। 3+1 महीने बाद केस ट्रांसफर विकल्प से जवाबदेही बढ़ेगी।

About Mahadand News

Check Also

Prevention of Corruption Act, 1988 की धारा 13 के अनुसार भी सरकारी स्टाफ को निजी सेवा में लगाना भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है।

Prevention of Corruption Act, 1988 की धारा 13 के अनुसार भी सरकारी स्टाफ को निजी …