*माँ — ईश्वर का सबसे सुंदर स्वरूप*
भोपाल से राधावल्लभ शारदा के साथ दीप्ति कौर की रपट
इस संसार में यदि कोई प्रेम बिना शर्त के मिलता है, तो वह केवल माँ का प्रेम है।माँ केवल जन्म देने वाली नहीं होती, बल्कि वह जीवन को संस्कार, करुणा, त्याग और प्रेम से सींचने वाली पहली गुरु होती है।
जब एक शिशु इस संसार में आता है, तब वह बोलना नहीं जानता, चलना नहीं जानता, संसार को पहचानना नहीं जानता — लेकिन माँ उसकी हर भावना को बिना शब्दों के समझ लेती है। यही माँ की ममता है, जो स्वयं भगवान का स्वरूप कही गई है।
भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में कहा है कि इस संसार में जो भी दिव्य गुण हैं — दया, क्षमा, प्रेम, त्याग, सहनशीलता — वे सब ईश्वर से ही उत्पन्न होते हैं। और यदि इन गुणों का जीवंत रूप कहीं दिखाई देता है, तो वह माँ में दिखाई देता है।
माँ अपने बच्चों के लिए स्वयं कष्ट सह लेती है, पर उनके जीवन में दुख नहीं आने देती। वह स्वयं भूखी रह सकती है, लेकिन अपने बच्चों को कभी भूखा नहीं देख सकती।
उसका हृदय समुद्र से भी गहरा और आकाश से भी विशाल होता है।
गीता हमें सिखाती है कि निःस्वार्थ भाव से किया गया कर्म ही सबसे बड़ा धर्म है। माँ का पूरा जीवन इसी निष्काम कर्मयोग का उदाहरण है।
वह बिना किसी अपेक्षा के दिन-रात अपने परिवार के लिए समर्पित रहती है। न उसे प्रशंसा चाहिए, न सम्मान उसके लिए बच्चों की मुस्कान ही सबसे बड़ा पुरस्कार है।
इसलिए भारतीय संस्कृति में कहा गया है —
“मातृ देवो भव”
अर्थात — माँ को देवता समान मानो।
जिस घर में माँ का सम्मान होता है, वहाँ ईश्वर की कृपा स्वयं निवास करती है। माँ के चरणों में केवल स्वर्ग ही नहीं, बल्कि पूरे जीवन की शांति और सफलता छिपी होती है।
आज की भागदौड़ भरी दुनिया में हम अक्सर अपने कार्यों में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि माँ के प्रेम और त्याग को सामान्य समझने लगते हैं।
लेकिन याद रखिए —जिस दिन माँ की छाया सिर से हट जाती है, उस दिन संसार की सारी दौलत भी मन को सच्चा सुख नहीं दे सकती।
यदि जीवन में सुख, शांति और ईश्वर की कृपा चाहिए, तो सबसे पहले माँ का सम्मान कीजिए, उनकी सेवा कीजिए, और उनके आशीर्वाद को अपने जीवन का सबसे बड़ा धन मानिए।
माँ केवल एक शब्द नहीं,
वह सम्पूर्ण सृष्टि का प्रेम, करुणा और भगवान का जीवंत आशीर्वाद है।
सभी माताओं को कोटि-कोटि प्रणाम। 🙏🙏🙏
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