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हमारे पेशे की विश्वसनीयता उस भरोसे पर टिकी है जो यह जगाता है, और वह भरोसा लगातार ईमानदारी और जवाबदेही से कमाया जाना चाहिए.” सी जे आई सूर्यकांत

हमारे पेशे की विश्वसनीयता उस भरोसे पर टिकी है जो यह जगाता है, और वह भरोसा लगातार ईमानदारी और जवाबदेही से कमाया जाना चाहिए.” सी जे आई सूर्यकांत

दिल्ली से वेदप्रकाश रस्तोगी के साथ भोपाल से राधावल्लभ शारदा द्वारा संपादित रपट – *विशेष टिप्पणी, पत्रकारिता का पहला पाठ विश्वास जीतना होता है, विश्वास का दूसरा नाम भरोसा है। जब आप किसी व्यक्ति का भरोसा जीत लेते हैं तो फिर वह व्यक्ति अपने पेट की बात भी आपको बता देता है कि उसे आप पर भरोसा है कि आप यह कहीं भी उजागर नहीं करेंगे कि समाचार अपको किसने दिया। पुराने समय में हम जब समाचार बनाते थे तब लिखा करते थे कि सूत्रों के अनुसार परंतु अब समय बदल गया है पत्रकार समाचार की पुष्टि के लिए संबंधित व्यक्ति से चर्चा कर उसके नाम का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि अमुक अधिकारी ने बताया कि? बस यही आपकी विश्वनियंता समाप्त होने लगती है आम नागरिक आप पर भरोसा नहीं करता और उसके मन में आता है कि जो बात अधिकारी ने बताई हैं बही सही है। उस समाचार में आपने जो कुछ लिखा है बह निर्थक है।*

*इसलिए भरोसा जीतों और विश्वास करना सीखो।*

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि न्याय का प्रशासन बेंच और बार के बीच पेशेवर भरोसे के रिश्ते पर निर्भर करता है.
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि राय में मतभेद और आलोचना जायज है लेकिन उन्हें निष्पक्षता संयम और संस्थागत ईमानदारी के सम्मान के साथ जाहिर किया जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत कानून, न्याय और कानूनी शिक्षा पर दूसरी मासिक व्याख्यान श्रृंखला में बोल रहे थे. उन्होंने कहा कि आज की थीम ‘कानूनी पेशे में नैतिकता का महत्व’ हमें ऐसे ही एक बुनियादी सिद्धांत की ओर ले जाती है.
सीजेआई सूर्यकांत ने आगे कहा कि हम अक्सर अपनी पेशेवर सफलता को अपनी दलीलों की गुणवत्ता या हमें मिले नतीजों से मापते हैं. फिर भी एक वकील की पेशेवर जिंदगी का एक और भी बुनियादी पैमाना है. वह सफलता कैसे हासिल की जाती है.
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने आगे कहा कि न्याय प्रणाली की गरिमा कुछ हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि बार के सदस्य कोर्टरूम के अंदर और बाहर कैसा व्यवहार करते हैं. उन्होंने कहा कि राय में मतभेद और आलोचना जायज हैं लेकिन उन्हें निष्पक्षता, संयम और संस्थागत ईमानदारी के सम्मान के साथ जाहिर किया जाना चाहिए. “हम अपनी असहमति को जिस तरह से ज़ाहिर करते हैं, वह उतना ही मायने रखता है जितना कि हम जो कहते हैं उसका सार.”
सीजेआई ने आगे अपने संबोधन में कहा कि एक ऐसी दुनिया में जो तेजी से सार्वजनिक दृश्यता और व्यावसायिक हितों से बनती जा रही है, व्यावसायिक नैतिकता हमारा रास्ता बनी रहनी चाहिए. यह पक्का करते हुए कि व्यक्तिगत अभिव्यक्ति न्याय प्रणाली को बनाए रखने वाले भरोसे की कीमत पर न हो.
उन्होंने कहा कि नैतिकता के लिए हमें उन जिम्मेदारियों पर भी सोचना होगा जो इस पेशे के खास अधिकारों के साथ आती हैं. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “अक्सर अनिश्चितता के समय में, वकील के पास जाने वाले व्यक्ति के लिए कानूनी पेशे की न्याय प्रणाली के साथ संपर्क का पहला बिंदू बन जाता है. इसलिए सलाह में ईमानदारी, प्रतिनिधित्व में मेहनत, पेशेवर फीस में निष्पक्षता और कमजोर केस लड़ने वालों के प्रति संवेदनशीलता बाहरी बातें नहीं हैं. ये पेशेवर जिम्मेदारी और सार्वजनिक सेवा के जरूरी बातें हैं.”

सीजेआई ने आगे कहा कि इन मूल्यों को कानूनी शिक्षा के शुरुआती चरण से ही विकसित किया जाना चाहिए, जिसके लिए छात्रों को न सिर्फ कानून सीखना होगा बल्कि उन हालात से निपटने के लिए आवश्यक निर्णय लेना भी सीखना होगा जिनमें पेशेवर जिम्मेदारियों को परखा जाता है. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने कहा, “कानूनी नैतिकता को सिर्फ आचार के नियमों को याद करने तक सीमित नहीं किया जा सकता. इसे भविष्य के वकीलों को मुश्किल सवालों का सामना करने, प्रतिस्पर्धा वाली जिम्मेदारियों को समझने और अपनी पसंद के नतीजों को समझने के लिए बढ़ावा देना चाहिए.”
सीजेआई ने कहा कि आखिर में ये नियम पेशेवर व्यवहार के मानक तय करते हैं. लेकिन जागरूक पेशेवर उन्हें हमेशा चलने वाली ताकत देता है और नैतिक आचरण को सिर्फ शिकायत आने पर ही वापस बुलाने की जिम्मेदारी नहीं माना जाना चाहिए.

सीजेआई ने कहा, “इसे बार, बेंच और जिन्हें कानूनी शिक्षा दी गई है, उनके रोजाना के फैसलों में जानकारी देनी चाहिए. हमारे पेशे की विश्वसनीयता उस भरोसे पर टिकी है जो यह जगाता है, और वह भरोसा लगातार ईमानदारी और जवाबदेही से कमाया जाना चाहिए.”

उन्होंने कहा कि न्याय का प्रशासन बेंच और बार के बीच पेशेवर भरोसे के रिश्ते पर निर्भर करता है. उन्होंने आगे कहा कि अदालतें वकीलों पर भरोसा करती हैं कि वे जरूरी तथ्य पेश करें, लागू कानून की पहचान करें और बौद्धिक ईमानदारी के साथ प्रतिस्पर्धी तर्कों की जांच करें.

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि हमारे वाद-प्रतिवाद प्रणाली (एडवर्सरियल सिस्टम) की ताकत सिर्फ जोरदार बहस करने की काबिलियत में नहीं है, बल्कि इस भरोसे में है कि मुकाबला नैतिक सीमाओं के अंदर हो. उन्होंने आगे कहा कि जब यह भरोसा कमजोर होता है तो इसके नतीजे किसी एक मामले से आगे बढ़कर न्याय प्रणाली में जनता के भरोसे तक पहुंच जाते हैं.

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