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आखिर पुलिस गृह विभाग एवं डी जी पी के आदेश की धज्जियां क्यों उड़ाते हैं।ओर दोहरी भूमिका।

आखिर पुलिस गृह विभाग एवं डी जी पी के आदेश की धज्जियां क्यों उड़ाते हैं।ओर दोहरी भूमिका।

भोपाल – आये दिन पत्रकारों को पुलिस विभाग के अधिकारी क्यों प्रताड़ित करते हैं और झूठी कहानी पर आधारित शिकायत पर प्रकरण दर्ज कर लेती है।
2010 के गृह विभाग पुलिस, और 2017 के पुलिस महानिदेशक के आदेश दिए गए थे कि यदि किसी के द्वारा पत्रकार के खिलाफ मामला दर्ज कराया है तो उसकी जांघ पुलिस अधीक्षक के द्वारा की जाय यदि मामला न्यायालय में विचाराधीन है तो उसे वापस लिया जाए।
2018 नवंबर में एक मामला सामने आया है जब फरियादी ने 14 नवंबर रात्रि में घटित हुई घटना का आवेदन 15 नवंबर को डाक से भेजा था उस आवेदन में एफ आई आर दर्ज करने का निवेदन किया था क्योंकि न्यायालय में विचाराधीन प्रकरण के समय जान से हाथ धोना पड़ेगा और कहा कि न्यायालय के प्रकरण को वापिस ले लो।
अभी भी पी एम हेल्प लाइन में पेंडिंग हैं।
मामले में पूर्व मुख्यमंत्री, एक मंत्री और एक कालेज के जो अब विश्वविद्यालय में तब्दील हो गया है में अवैध रूप से प्रवेश का है।
तत्कालीन मुख्य सचिव श्री आदित्य बिक्रम सिंह ने नोट सीट में लिखा था कि ऐसा करना अनुचित है और इसका संदेश गलत जायेगा।
तत्कालीन मुख्य सचिव श्री आदित्य बिक्रम सिंह की टीप को अनदेखा कर तथा टेकनीकल विभाग के नियमों को दरकिनार करते हुए मामूली मिस्टेक मानते हुए रुपए जुर्माना जो 24 लाख रुपए होता है को रुपए 5 लाख कर दिया नोट सीट में मामला आर के डी एफ कालेज का था परन्तु अंतिम समय नोट सीट में हाथ से सत्यसांई इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी जो अब विश्वविद्यालय बन गया है को जोड़ दिया।
यह मामला इसलिए जाहिर किया जा रहा है कि पुलिस की दोहरी भूमिका में रहती है।

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