Section 17 ए के कारण बच रहे हैं भ्रष्ट अफसर और समाचार पत्र मालिक यदि प्रसार संख्या की जांच कराई जाए तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आयेंगे
यदि सरकार की इच्छा शक्ति कि देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के भ्रष्टाचार मुक्त भारत के आव्हान को साकार करना है तो फिर 17 ए को न मानते हुए शीघ्र जांच के आदेश भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों के लिए देना चाहिए।
दैनिक समाचार पत्रों का भोतिक परीक्षण किया जाना चाहिए तो दूध का दूध और पानी हो जाएगा।
एक प्रकरण में जस्टिस नागरत्ना ने निष्कर्ष निकाला कि जांच प्रक्रिया के प्रारंभिक चरण में ही बाधा खड़ी करने वाली धारा 17A न केवल संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती है, बल्कि भ्रष्टाचार से लड़ने के प्रति भारत की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को भी कमजोर करती है। इसलिए यह प्रावधान संवैधानिक रूप से टिकाऊ नहीं है।
समाचार पत्रों के मालिकों के द्वारा आर्थिक धोखाधड़ी एवं भ्रष्टाचार और इस भ्रष्टाचार में सामिल है जनसंपर्क एवं केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधिकारी
राज्य सरकार के जनसंपर्क विभाग एवं केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा समाचार पत्रों के मालिकों को उनके द्वारा दिए गए सी ए,ए वी सी और रजिस्ट्रार न्यूज पेपर आफ इंडिया के प्रमाण पत्र के आधार पर प्रमानित प्रसार संख्या पर विज्ञापन दर मिलती है जो कि विभाग के अधिकारियों के द्वारा वगैर भोतिक परीक्षण के कागजों के आधार पर दिया जाता है । इस तरह केंद्र और राज्य सरकार के साथ आर्थिक धोखाधड़ी करते हैं और करोड़ों रुपए के विज्ञापन झूठी प्रसार संख्या बता कर अनुचित लाभ लेते हैं। राज्य सरकार और केंद्र सरकार के अधिकारियों की मिली भगत से समाचार पत्रों के मालिकों द्वारा आर्थिक घोटाला किया जा रहा है।
वर्ष 2019 ,20 और 21 में कोरोनावायरस के समय केंद्र सरकार से विज्ञापन हेतु स्वीकृत समाचार पत्रों की प्रसार संख्या 60 लाख प्रतिदिन से अधिक थी भोपाल में तब भोपाल की आवादी 25 लाख से अधिक नहीं थी। मतलब एक व्यक्ति को कम से कम 2 दैनिक समाचार पत्र मिलते थे।जिसकी शिकायत राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो में की परंतु आज तक विभाग द्वारा स्वीकृति नहीं दी गई है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार पहले नंबर पर उन समाचार पत्रों का है जो बगैर विज्ञापन मिले जन हित और देश हित के समाचारों को पूरा पेज विज्ञापन मिलने के बाद ही समाचारों को दो कालम से अधिक स्थान नहीं देते हैं और सरकार बह चाहें केंद्र की हो या राज्य की ।
यह सब मात्र विज्ञापन देने या न देने से जुड़ा हुआ नहीं है इसके पीछे एक बड़ा कारण है।
काम करने वाले पत्रकारों और गैर पत्रकारों को मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और नियुक्ति पत्र नहीं देने का है
मीडिया संस्थानों के मालिकों द्वारा जो आर्थिक रूप से सरकार को ठगा जा रहा है मतलब सरकार को आर्थिक रूप से लूट कर नुकसान पहुंचा रहे हैं जो कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है। इस आर्थिक अपराध में सहयोगी के रूप में केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारी और कर्मचारी का एक बड़ा गठजोड़ है जिसे एक आर्थिक माफिया कह सकते हैं।
यदि सरकार की इच्छा शक्ति हो कि देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के भ्रष्टाचार मुक्त भारत के आव्हान को साकार करना है तो जांच के आदेश जारी करना चाहिए।
राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने कहा था कि केंद्र से एक रुपया जाता है और 85 पैसे भ्रष्टाचार की कोख में समा जाता है मतलब साफ है कि एक इमानदार प्रधानमंत्री ने सबको आइना दिखा दिया था परन्तु भ्रष्टाचार के गठजोड़ ने प्रधानमंत्री के साफ संकेत को भी निगल लिया ।
तो बात समाचार पत्रों के मालिकों की रही उसने भी बहती गंगा में हाथ धो लिए।
अब मैं बात करता हूं उन दैनिक समाचार पत्रों की बह भी कोरोना वायरस के समय की जब भोपाल की आवादी लगभग तीस लाख मान ली जाय तब केंद्र सरकार के विज्ञापन दाता विभाग डी ए वी पी के वेव साइट्स पर जिन समाचार पत्रों की वार्षिक रिपोर्ट चढ़ी हुई है उनकी संख्या लगभग 250, होगी जिसमें साप्ताहिक मासिक पत्रिका और दैनिक समाचार पत्र है कि प्रसार संख्या प्रति दिन देखकर सब चकित हो जायेगें ,ये आंकड़े केंद्र सरकार की विभाग की वेबसाइट पर देखी जा सकती है।
इन अखबारों में से एक समाचार पत्र को मध्यप्रदेश सरकार की सहयोगी संस्थान माध्यम ने कोरोनावायरस वर्ष में लगभग एक करोड़ के विज्ञापन दिए।
मध्यप्रदेश सरकार के जनसंपर्क विभाग ने कितने दिये लम्बी फेहरिस्त है।
आपको आश्चर्य होगा कि जब आवागमन के साधन कम थे और व्यक्ति अपनी जान को जोखिम में डालने का काम कैसे करेगा क्या हबा में उड़कर समाचार पत्र अपने ग्राहक तक पहुंचते थे, खैर
यह बात तो उस सूची के दैनिक समाचार पत्रों की है यदि 15 हजार तक कि प्रसार संख्या बाले भोपाल से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्रों की बात करें तो फिर भोपाल के एक व्यक्ति को प्रतिदिन औसतन तीन समाचार पत्र मिलना चाहिए।
सरकार के जनसंपर्क विभाग ने एक पालीसी बनाई है उस के अनुसार विज्ञापन दिए गए हैं।
इन प्रसार संख्या की जांच का अधिकार जैसा कि मेरी जानकारी में है एक कमेटी बनाई गई है उसमें एक प्रतिनिधि कलेक्टर का, एक जनसंपर्क विभाग का एक वाणिज्य विभाग कि और शयाद एक विजली विभाग का।
पिछले कई दिनों से कलेक्टर को एक पत्र दिया गया है राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो में भ्रष्टाचार की शिकायत 2022 में की।
राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने प्रमुख सचिव जनसंपर्क को पत्र लिखकर जांच करने की अनुमति मांगी परंतु अभी तक नहीं मिली 2022 में शिकायत 2025 तक जांच की अनुमति नहीं।
केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की वेबसाइट के आधार पर प्रसार संख्या के दस्तावेज के पुख्ता सबूत मानकर प्रस्तुत कर रहा हूं।
लोगों का कहना है कि देश का सबसे बड़ा सकेंडल है और भ्रष्टाचार करने वाले दूसरों के भ्रष्टाचार उजागर करते,व्यापम, पेरामेडिकल तो फिर बहुत ही छोटे हैं।
देखना है रिजल्ट कब तक आता है ।
धारा 17 ए ईमानदार लोक सेवकों की आड़ में भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण – जस्टिस नागरत्ना
सरकारी नौकरी करने वालों को भ्रष्टाचार करने की खुली छूट
क्या है धारा 17 ए, जुलाई 2018 में भ्रष्टाचार निरोधक कानून,1988 में जोड़ी गई धारा 17 ए के तहत किसी भी सरकारी अफसर के खिलाफ उसकी ड्यूटी के दौरान लिए गए फैसले को लेकर जांच, पूछताछ या जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकरण से मंजूरी लेना जरूरी है।
एक प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीश की अलग अलग राय है ।
जस्टिस बी बी नागरतना ने इसे असंवैधानिक बताते हुए खत्म करने की बात कही है। उन्होंने कहा कि यह कानून भ्रष्टाचार निरोधक कानून के मकसद के खिलाफ है और इससे जांच की प्रक्रिया रुक जाती है, जिससे भ्रष्ट अफसरों को बचाव मिल जाता है।
बहीं जस्टिस के बी विश्वनाथन ने इसे संविधान सम्मत बताया है।
ईमानदार लोक सेवकों की आड़ में भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण : जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A को क्यों असंवैधानिक ठहराया?
सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा कि जांच या अन्वेषण शुरू करने से पहले पूर्व स्वीकृति की शर्त कानून के उद्देश्य के ही विपरीत है और यह प्रावधान ईमानदार लोक सेवकों की रक्षा करने के बजाय वास्तव में भ्रष्ट लोक सेवकों को बचाने का काम करता है।
अपने पृथक निर्णय में जो कि जस्टिस के.वी. विश्वनाथन के साथ गठित पीठ के विभाजित फैसले का हिस्सा था जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि असली प्रश्न यह नहीं है कि धारा 17A के तहत स्वीकृति कौन देगा बल्कि यह है कि क्या इस प्रकार की पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता ही होनी चाहिए।
उनके अनुसार यह प्रावधान जांच की प्रक्रिया को प्रारंभिक स्तर पर ही रोक देता है। इस प्रकार भ्रष्ट अधिकारियों को अनुचित संरक्षण प्रदान करता है।
उन्होंने अपने निर्णय में स्पष्ट शब्दों में कहा कि यद्यपि इस प्रावधान का प्रत्यक्ष उद्देश्य ईमानदार लोक सेवकों को झूठी, दुर्भावनापूर्ण और निराधार जांच से बचाना बताया गया, लेकिन इसका अंतर्निहित उद्देश्य यह है कि यह धारा एक ऐसे कवच की तरह कार्य करे जो भ्रष्ट लोक सेवकों को बचा सके। जांच या अन्वेषण को प्रारंभ से ही स्वीकृति पर निर्भर बना देना भ्रष्ट अधिकारियों को न केवल संरक्षण देता है, बल्कि उन्हें जांच को विफल करने और आपराधिक न्याय प्रणाली को बाधित करने का अवसर भी प्रदान करता है।
जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि धारा 17A का इतिहास यह दर्शाता है कि यह पहले से ही असंवैधानिक ठहराए गए प्रावधानों को पुनर्जीवित करने का तीसरा प्रयास है।
उन्होंने वर्ष 1998 के ऐतिहासिक निर्णय विनीत नारायण बनाम भारत संघ का उल्लेख किया, जिसमें सीबीआई द्वारा वरिष्ठ लोक सेवकों के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले सरकारी स्वीकृति की आवश्यकता संबंधी कार्यकारी निर्देशों को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था। इसके बाद दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 की धारा 6A लाई गई, जिसे 2014 में सुब्रमण्यम स्वामी बनाम निदेशक, सीबीआई मामले में संविधान पीठ ने अनुच्छेद 14 का उल्लंघन मानते हुए निरस्त कर दिया।
जस्टिस नागरत्ना के अनुसार धारा 17A उसी असफल व्यवस्था को नए रूप में कानून में वापस लाने का प्रयास है।
उन्होंने यह भी कहा कि भले ही धारा 17A देखने में सभी लोक सेवकों पर समान रूप से लागू होती प्रतीत होती हो, लेकिन वास्तविकता में यह उन अधिकारियों को संरक्षण देती है जो निर्णय लेने की स्थिति में होते हैं। “अनुशंसा” और “निर्णय” जैसे शब्द स्वाभाविक रूप से उच्च स्तर के अधिकारियों से जुड़े होते हैं, जबकि निचले स्तर के अधिकारी केवल फाइलें तैयार करते हैं और अंतिम निर्णय नहीं लेते। इस प्रकार, यह प्रावधान व्यवहार में एक विशेष वर्ग के लोक सेवकों को जांच से बचाता है, जो समानता के संवैधानिक सिद्धांत के विपरीत है।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इस तरह का वर्गीकरण न तो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के उद्देश्य से तार्किक रूप से जुड़ा है और न ही विधि के शासन के सिद्धांतों के अनुरूप है। यह अनुच्छेद 14 के अंतर्गत समानता की कसौटी पर भी खरा नहीं उतरता।
उन्होंने धारा 17A में निहित मनमानेपन की ओर भी ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, जिस प्राधिकरण को पूर्व स्वीकृति देने या न देने का अधिकार है, वह स्वयं उस निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है जिसकी जांच की जानी है। इससे हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है। इसके अतिरिक्त, नीतिगत पूर्वाग्रह, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया और विभागीय दबाव जैसी परिस्थितियां स्वीकृति देने की प्रक्रिया को और भी अधिक पक्षपातपूर्ण बना सकती हैं, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
जस्टिस नागरत्ना ने इस बात से भी असहमति जताई कि “सरकार” या “सेवा से हटाने में सक्षम प्राधिकारी” शब्दों की व्याख्या लोकपाल या लोकायुक्त के रूप में की जाए।
उन्होंने इसे न्यायिक कानून-निर्माण करार देते हुए कहा कि केवल स्वीकृति देने वाले प्राधिकारी को बदल देने से प्रावधान की असंवैधानिकता समाप्त नहीं हो जाती।
उनके अनुसार, यदि वास्तव में पूर्व स्वीकृति की कोई व्यवस्था होनी भी थी, तो वह सरकार से स्वतंत्र, निष्पक्ष और स्वायत्त संस्था के माध्यम से होनी चाहिए थी। ऐसे किसी तंत्र के अभाव में धारा 17A अस्पष्ट, दिशाहीन और निष्प्रभावी हो जाती है।
अंततः जस्टिस नागरत्ना ने निष्कर्ष निकाला कि जांच प्रक्रिया के प्रारंभिक चरण में ही बाधा खड़ी करने वाली धारा 17A न केवल संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती है, बल्कि भ्रष्टाचार से लड़ने के प्रति भारत की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को भी कमजोर करती है। इसलिए यह प्रावधान संवैधानिक रूप से टिकाऊ नहीं है।
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