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*75 साल का पिता गिर पड़ा और सतना एसपी की आंख नहीं खुली* “अंग्रेज़ चले गए… लेकिन कुछ अंग्रेज़ अब भी ज़िंदा हैं!”

*75 साल का पिता गिर पड़ा और सतना एसपी की आंख नहीं खुली*
“अंग्रेज़ चले गए… लेकिन कुछ अंग्रेज़ अब भी ज़िंदा हैं!”

भारत आज़ाद हो गया, अंग्रेज़ चले गए — पर अफसोस, उनके कुछ विचारों के वारिस आज भी हमारे बीच हैं। यह वही लोग हैं जो लोकतंत्र में भी अपने आप को “अंग्रेज़ों के ज़माने का आईपीएस” समझते हैं। भूल जाते हैं कि यह लोकतंत्र है, और लोकतंत्र में अधिकारी नहीं, जनता मालिक होती है।

हम बात कर रहे हैं सतना के एसपी हंसराज सिंह की — जिनके कार्यालय के बाहर एक 75 वर्षीय बुजुर्ग पिता, अपने बेटे के लिए न्याय की गुहार लेकर घंटों खड़ा रहा।
धूप में तड़पता रहा, प्यासा रहा… और आखिरकार बेहोश होकर गिर पड़ा।
पर अफसोस, अंग्रेज़ों की विरासत वाले इस एसपी साहब के दफ़्तर का गेट नहीं खुला।
जनता की सेवा की शपथ लेने वाले अधिकारी का दिल नहीं पसीजा।

कितना विडंबनापूर्ण है —
जब कोई बड़ा नेता आता है, तो यही अधिकारी चटाई बिछाकर, एक किलोमीटर पहले जाकर स्वागत करते हैं।
पर जब एक आम नागरिक, एक पीड़ित पिता न्याय की उम्मीद लेकर आता है — तो वही दरवाज़ा उसके लिए बंद हो जाता है।

क्या यही है “जनता के सेवक” होने का प्रमाण?
क्या एसपी साहब अब सतना के मालिक बन बैठे हैं?
अगर इस तरह की असंवेदनशीलता ही “प्रशासनिक गरिमा” बन गई है, तो सच मानिए, यह लोकतंत्र पर कलंक है।

सोचिए ज़रा —
अगर यही घटना किसी “विशेष वर्ग” या “राजनीतिक परिवार” के साथ होती,
तो पूरा सिस्टम हिल जाता, बयानबाज़ी होती, जांचें बैठ जातीं,
और फोटोशूट के साथ न्याय की झलकियां मीडिया में चमकतीं।
लेकिन यहाँ?
एक बुजुर्ग पिता गिर पड़ा — और प्रशासन की संवेदनाएं भी शायद बेहोश हो गईं।

याद रखिए —
लोकतंत्र में जनता सरकार की जननी है।
अधिकारी जनता के सेवक हैं, शासक नहीं।
हंसराज सिंह जैसे अधिकारियों को समझना होगा कि वर्दी सम्मान की प्रतीक है, अहंकार का कवच नहीं।

सतना की जनता यह सवाल पूछ रही है —
क्या यहां “अंग्रेज़ों का राज” अब भी जारी है?
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से भी उम्मीद है कि इस शर्मनाक घटना पर संज्ञान लें,
क्योंकि अगर ऐसे मामलों पर मौन रहा गया,
तो सवाल सिर्फ एसपी पर नहीं, पूरे तंत्र पर उठेंगे।

संपादक समग्र प्रदेश
उमेश गौतम

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