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डॉ जो जे, पी, अस्पताल में कार्यरत हैं । आज के समय में जितने भी डाक्टर सरकारी नौकरी में हैं लगभग सभी किसी न किसी प्राइवेट अस्पताल में काम करते हैं।
सरकार ने लगता है इन्हें प्राईवेट प्रेक्टिस की अनुमति दी है। अनुमति नहीं दी होती तो ये अस्पताल के अलावा कहीं काम नहीं करते।
मंहगाई का समय है सरकार के द्वारा दी जा रहे वेतन से परिवार का भरन पोषण नहीं हो रहा है।
फिर आज के समय की सोसायटी के अनुसार रहन सहन करना होता है।
निजी प्रैक्टिस में मरीज से पहली मुलाकात की फीस कम से कम 500 रुपए तो होगी ही, यदि एक दिन में 10 मरीज देखें तो 5000 रुपए, यदि माह में 20 दिन काम किया तो रुपए एक लाख होता है तो एक साल में 12 लाख रुपए की अतिरिक्त आय होती है वेतन और अन्य सुविधाओं को छोड़कर।
यहां तक तो ठीक परंतु उस मरीज़ को जो दबा लिखी जाती है बह भी उसी मेडिकल स्टोर पर ही मिलती है जिनसे इनका अनुबंध होता है।तब उस मेडिकल स्टोर से दबा का कमीशन।
अच्छा हुआ कि केंद्र सरकार ने जी एस टी कम कर दिया लेकिन दबा निर्माता कंपनी दबाओं के मुल्य बढ़ा देंगे।
मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्यों में कफ सीरप से बच्चों की मौत का जिम्मेदार सिर्फ दबा निर्माता कंपनी ही नहीं डाक्टर भी मोटे कमीशन के कारण।
बच्चों की मौत एक सामुहिक हत्याकांड है और हत्या करने वाले को आजीवन कारावास, उनकी समस्त सम्मति जप्त के साथ इस अवैध कारोबार से होने वाली आय का लाभ लेने वालो को भी दोषी मानना चाहिए और उन्हें भी सजा दी जानी चाहिए।
*यदि सरकार देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के साथ है तो कठोर कदम उठाए और समय पर निर्णय लें*।
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