*पत्रकारों के आवास नवीनीकरण न होने की जबावदारी किसकी*प्रश्न क्या कोरोना काल में मंत्रालय बंद था*
भोपाल नगर निगम के अतिक्रमण की जबावदारी निभाने वालों्की आंखों पर गांधी जी बाली काली पट्टी बंधी हुई है।
न्यायालय में मूर्ति से काली पट्टी हट गई है परन्तु प्रशासनिक अधिकारियों की आंखों की पट्टी कैसे हटेंगी यह यक्ष प्रश्न चिन्ह लगा है।
एक छोटा सा उदाहरण है कि मध्यप्रदेश सरकार के गृह विभाग में पत्रकारों के आवास का नवीनीकरण अटका हुआ है। यदि पूरी स्थिति का आकलन किया जाए तो लगता है कि कोरोना काल में मंत्रालय बंद था। मतलब सरकारी काम नहीं हो रहे थे।
देश के कथित चौथे स्तम्भ के साथ यदि इस तरह से व्यवहार हुआ है तो फिर आम नागरिक के साथ कैसा सलूक किया गया है राम ही मालिक।
एक पत्रकारों के अध्यक्ष ने मध्यप्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कहा था कि आवास नवीनीकरण नहीं होने की सजा पत्रकारों को क्यों इस दो वर्ष का किराया उन अधिकारियों से वसूला जाना चाहिए जिन्होंने अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया।
केंद्र को दो सप्ताह में अधिकारियों को निर्देश देने का आदेश
हर सड़क पर पैदल यात्रियों के लिए अतिक्रमण- मुक्त जगह सुनिश्चित करें: सुप्रीम कोर्ट
नयी दिल्ली। देश भर की सड़कों पर पैदल चलने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उच्चतम न्यायालय ने सख्त रुख अपनाया है। सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि जहां भी सड़कें बनी हैं, वहां पैदल यात्रियों के लिए अलग, स्पष्ट रूप से चिह्नित और पूरी तरह अतिक्रमण मुक्त स्थान उपलब्ध कराया जाए। अदालत ने साफ
किया कि पैदल चलने वाले लोगों को यह भरोसा मिलना चाहिए कि वे बिना किसी अनियंत्रित वाहन या दुर्घटना के खतरे के सुरक्षित आवागमन कर सकते हैं।
उच्चतम न्यायालय में
न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार की ओर से उपस्थित के एम नटराज को संबंधित
अधिकारियों को इस संबंध में तत्काल निर्देश जारी करने का आदेश दिया।
पीठ ने कहा कि मोटर वाहनों के रास्ते और पैदल यात्रियों के स्थान के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। अदालत ने इस व्यवस्था को लागू करने और अधिकारियों को दिशा-निर्देश देने के लिए सरकार को दो सप्ताह का समय दिया है।
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