राजेन्द्र कानूनगो
वरिष्ठ समीक्षक।
*रक्षक ही बन रहे भक्षक*
प्रांतीय मीडिया प्रभारी दीप्ति कौर की रपट
मध्यप्रदेश में लोकायुक्त संगठन की स्थापना वर्ष 1982 में एक ऐसे स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्थान के रूप में की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य राज्य में प्रशासनिक शुचिता बनाए रखना और भ्रष्ट अधिकारियों पर नकेल कसना था। लोकायुक्त के अधीन कार्य करने वाली ‘विशेष पुलिस स्थापना’ इस संस्था की रीढ़ है, जिसका काम भ्रष्ट लोकसेवकों को रंगे हाथों पकड़ना और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना है। लेकिन हाल के वर्षों में कुछ ऐसी घटनाएं और खुलासे सामने आए हैं, जिन्होंने इस रक्षक संस्था की विश्वसनीयता पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब भ्रष्टाचार मिटाने की जिम्मेदारी उठाने वाले पुलिस अधिकारी और कर्मचारी खुद रिश्वतखोरी के दलदल में फंसने लगें, तो यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक खतरनाक संकेत
है।
हाल ही में भोपाल के एक बड़े अखबार के स्टिंग ऑपरेशन और विभिन्न जांचों में लोकायुक्त पुलिस के भीतर चल रहे एक संगठित भ्रष्टाचार नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ है। इस खुलासे ने राज्य में तहलका मचा दिया कि जो टीम दूसरों को ट्रैप करती है, उसके अपने ही तकनीकी सहायक, आरक्षक, रीडर और यहां तक कि डीएसपी स्तर के अधिकारी मामलों को कमजोर करने के लिए सौदेबाजी कर रहे हैं।
जब लोकायुक्त पुलिस किसी भ्रष्ट अधिकारी को ट्रैप करती है, तो संस्था के भीतर मौजूद कुछ काली भेड़ें उस आरोपी अधिकारी से संपर्क साधती हैं। एफआईआर को कमजोर करने, गवाहों को मैनेज करने और कोर्ट में केस को ढीला करने के एवज में कई लाख रुपये की मांग उससे की जाती है।
स्टिंग ऑपरेशनों में लोकायुक्त के तकनीकी कर्मचारियों को यह कहते सुना गया कि वे आरोपी के ‘वॉयस सैंपल’ को बदल देंगे या उसे फॉरेंसिक जांच में इस तरह पेश करेंगे कि अदालत में वह साक्ष्य के रूप में टिक ही न पाए।
चुराते सब हैं, जो पकड़ा गया वो चोर, यह मानसिकता लोकायुक्त पुलिस के कुछ अधिकारियों में घर कर चुकी है। जब पकड़ने वाले ही यह मानने लगें कि भ्रष्टाचार एक सामान्य प्रक्रिया है, तो आम जनता का न्याय प्रणाली और शुचिता से विश्वास उठना स्वाभाविक है।
मध्यप्रदेश में लोकायुक्त पुलिस या उससे जुड़े कर्मियों के भ्रष्टाचार के मामले केवल छोटे स्तर तक सीमित नहीं हैं। कुछ समय पहले लोकायुक्त पुलिस द्वारा एक पूर्व आरक्षक सौरभ शर्मा के ठिकानों पर की गई छापेमारी में लगभग 8 करोड़ रुपये की बेनामी संपत्ति, करोड़ों की नकदी और भारी मात्रा में चांदी बरामद हुई थी। यद्यपि यह कार्रवाई लोकायुक्त ने ही की थी, लेकिन यह इस बात का भी प्रमाण है कि पुलिस महकमे के भीतर किस स्तर पर अवैध कमाई का खेल चल रहा है।
इसके अलावा, कई ऐसे मामले भी आंतरिक जांच में सामने आए हैं, जहां लोकायुक्त के ही जांच अधिकारियों पर आरोप लगे कि उन्होंने रिश्वत लेकर खत्मा रिपोर्ट लगा दी या रंगे हाथों पकड़े गए आरोपियों को क्लीन चिट दे दी। यह स्थिति तब और भयावह हो जाती है जब भ्रष्टाचार विरोधी विंग का ही कोई बड़ा अधिकारी किसी मामले को रफा-दफा करने के लिए पर्दे के पीछे से सूत्र हिलाता है।
लोकायुक्त पुलिस में भ्रष्टाचार के कई कारण हैं।
जैसे कि लोकायुक्त पुलिस की अपनी कोई स्वतंत्र सीधी भर्ती नहीं होती। इसमें मध्यप्रदेश पुलिस विभाग से ही अधिकारियों और कर्मचारियों को प्रतिनियुक्ति पर भेजा जाता है। कई बार राजनीतिक रसूख या विशेष साठगांठ के दम पर जुगाड़ू पुलिस अधिकारी लोकायुक्त में पोस्टिंग पा लेते हैं। उनका उद्देश्य सेवा करना नहीं, बल्कि इस पद की धौंस दिखाकर अवैध वसूली करना होता है।
लोकायुक्त पुलिस के पास किसी भी सरकारी दफ्तर में छापा मारने और किसी भी अधिकारी को बदनाम या बहाल करने की असीमित शक्ति होती है। जहां शक्ति का केंद्रीकरण अधिक होता है और आंतरिक निगरानी कमजोर होती है, वहां भ्रष्टाचार की गुंजाइश बढ़ जाती है। लोकायुक्त के भीतर आंतरिक सतर्कता विंग उतनी सक्रिय नहीं रही है जो अपने ही अधिकारियों पर नजर रख सके।
कई बार राज्य के रसूखदार राजनेताओं और वरिष्ठ नौकरशाहों के खिलाफ चल रही जांचों को दबाने के लिए लोकायुक्त के पुलिस अधिकारियों को ‘टूल’ की तरह इस्तेमाल किया जाता है। जब अधिकारियों को यह समझ आ जाता है कि बड़े मगरमच्छों को बचाने पर उन्हें संरक्षण मिलेगा, तो वे खुद भी बेखौफ होकर भ्रष्टाचार करने लगते हैं।
एक आम नागरिक जब किसी भ्रष्ट पटवारी, इंजीनियर या डॉक्टर की शिकायत लेकर लोकायुक्त के पास जाता है, तो वह उसे न्याय की आखिरी उम्मीद मानता है। लेकिन जब उसे पता चलता है कि लोकायुक्त का रीडर या डीएसपी ही आरोपी से मिला हुआ है, तो उसका व्यवस्था से भरोसा उठ जाता है। जब लोकायुक्त पुलिस के भीतर ही ‘मैनेजमेंट’ का रास्ता खुल जाता है, तो अन्य विभागों के भ्रष्ट अधिकारियों का डर पूरी तरह समाप्त हो जाता है। उन्हें पता होता है कि अगर वे पकड़े भी गए, तो कुछ लाख रुपये देकर लोकायुक्त के नेटवर्क से छूट जाएंगे।
मध्यप्रदेश की कठोर निर्णय लेने और भ्रष्टाचार समाप्त करने बीड़ा उठाने वाली डॉ मोहन यादव की सरकार
यदि मध्यप्रदेश में लोकायुक्त की गरिमा को पुनः बहाल करना चाहती है, तो उसे कड़े और अभूतपूर्व कदम उठाने होंगे।
लोकायुक्त पुलिस को सामान्य पुलिस विभाग की प्रतिनियुक्ति पर निर्भर रहने के बजाय अपनी स्वतंत्र विंग और सीधी भर्ती शुरू करनी चाहिए।
लोकायुक्त संगठन के भीतर एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली ‘एंटी-करप्शन सेल’ होना चाहिए जो केवल अपने ही अधिकारियों और कर्मचारियों के आचरण और संपत्ति की जांच करे।
तकनीकी पारदर्शिता ट्रैप की कार्रवाई, वॉयस रिकॉर्डिंग और डिजिटल साक्ष्यों को तुरंत ब्लॉकचेन या क्लाउड सर्वर पर सुरक्षित किया जाना चाहिए, ताकि स्थानीय स्तर पर कोई कर्मचारी साक्ष्यों से छेड़छाड़ न कर सके।
मध्यप्रदेश में लोकायुक्त पुलिस के भीतर भ्रष्टाचार का उजागर होना एक खतरे की घंटी है। यह इस बात का संकेत है कि दीमक अब उस दवा में ही लग चुकी है जो पेड़ को बचाने के लिए डाली गई थी। मुख्यमंत्री, उच्च न्यायालय और स्वयं लोकायुक्त महोदय को इस आंतरिक सड़न को साफ करने के लिए ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनानी होगी। जब तक लोकायुक्त अपने भीतर छिपे भ्रष्ट अधिकारियों को जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजेगा, तब तक राज्य से भ्रष्टाचार का उन्मूलन महज़ एक कल्पना बना रहेगा। रक्षकों को अपनी पवित्रता साबित करनी ही होगी, क्योंकि यदि न्याय के मंदिर के पहरेदार ही बिकने लगेंगे, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर हो जाएगी।
जनता यह उम्मीद करती है कि प्रदेश की मोहन सरकार इस मामले में गंभीरता से कठोर कदम उठाएगी। अब आने वाला समय बताएगा कि इस मामले में क्या होता है।
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