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सोशल मीडिया का दिखावा असली चेहरा कहाँ छिपा है।

सोशल मीडिया का दिखावा असली चेहरा कहाँ छिपा है।

भोपाल से राधावल्लभ शारदा के साथ दीप्ति कौर की रपट

आजकल सोशल मीडिया पर एक अजीब नजारा दिखता है।

व्हाट्सएप और फेसबुक की चकाचौंध में बुद्धिमान-जागरूक लोग शुभकामनाओं की बाढ़ ला देते हैं।

जन्मदिन की बधाइयाँ, त्योहारों के संदेश, प्रेरणादायक विचार। लेकिन जब यही लोग सड़क पर, बाजार में या मोहल्ले में आमने-सामने आते हैं, तो मुस्कान गायब नजरें चुरा ली जाती हैं, सिर झुका लिया जाता है, या फिर बिना बोले मुंह फेर लिया जाता है। यह कैसा दोहरा चरित्र है, ऑनलाइन दोस्तों की फौज है, लेकिन वास्तविक जीवन में अकेलापन ही नजर आता है।

ऐसे दिखावे से समाज का कल्याण कैसे संभव? धीरे-धीरे भरोसा टूट रहा है, पड़ोसी पर, रिश्तेदार पर, दोस्त पर। कल्पना कीजिए, एक व्यक्ति ऑनलाइन लिखता है, सबका भला हो, लेकिन अगले ही दिन उसी साथी को अनदेखा कर देता है।

यह वही व्यक्ति है जो मीटिंग में सहयोग की बात करता है, पर पीठ पीछे आलोचना।

सोशल मीडिया अच्छे शब्द लिखने का माध्यम बन गया है, लेकिन व्यवहार में उतरना भूल गए हम सम्मान, अपनापन और विश्वास ये तो बस स्क्रीन पर टाइप हो जाते हैं, दिल तक नहीं पहुँचते।

समाज को मजबूत बनाने के लिए दिखावे की चमक-दमक छोड़नी होगी। सामने वाले का सच्चे मन से सम्मान करें
एक मुस्कान दें, हाथ मिलाएँ, बातचीत में रुचि लें। शब्दों और कर्मों में समानता लाएँ। याद रखें, एक छोटा-सा वास्तविक व्यवहार लाख टाइप किए संदेशों से ज्यादा प्रभाव डालता है। गलतफहमियाँ मिटेंगी, भ्रम दूर होंगे, दूरियाँ कम होंगी। आईना देखिए क्या आपका ऑनलाइन चेहरा असली है, या सिर्फ मास्क सच्चाई से ही विश्वास बनेगा, तब समाज बचेगा।
सच्चाई अपनाएँ, दिखावा छोड़ें
यही समाज सुधार का पहला कदम है।

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